Wednesday, 29 July 2020

ऐश्वर्या राय ने कोरोना को मात देने के बाद बहुत दिन बाद पहली पोस्ट इंस्टाग्राम पर डाली है।

अभिनेत्री ऐश्वर्या राय और उनकी बेटी आराध्या बचन ने  कोरॉना को मत दे दी है। और उन्होंने बहुत दिन बाद इंस्टाग्राम पर
पोस्ट डाली है।
खाश बात 
० ऐश्वर्या राय ने कोरोना को दी मात 
० पहली बार इंस्टाग्राम पर की पोस्ट
० और बहुत सारी कई बात 

टुडे न्यूज

   आज की कोरोना न्यूज

* कोरोनावायरस पर नवीनतम जानकारी (29 जूलाई 2020, सुबह 8 बजे तक) * 👇

▪ सक्रिय मामले: *5,09,447*
▪ ठीक / अस्पताल से छुट्टी: *9,88,209*
▪ मत्यु के मामले: *34,193*

* कृपया घर पर रहें और लॉकडाउन और सामाजिक दूरी की सलाह का पालन करें ताकि आप स्वयं, परिवार और समुदाय को सुरक्षित रख सके। 

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Saturday, 25 July 2020

मेंढक की प्रेरणादायक कहानी

बहरे मेंडक की कहानी

एक तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे। उस तालाब के ठीक बीचोंबीच एक बडा-सा लोहे का खम्बा वहां के राजा ने लगवाया हुआ था। एक दिन तालाब के मेंढको ने निश्चय किया कि “क्यों ना इस खम्भे पर चढ़ने के लिए रेस लगाई जाये”, जो भी इस खंभे पर चढ़ जायेगा, उसको प्रतियोगिता का विजेता माना जायेगा।


रेस का दिन निश्चित किया गया। कुछ दिनों बाद रेस का दिन आ गया। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए वहां कई मेढ़क एकत्रित हुए, पास के तालाब से भी कई मेंढ़क रेस में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे हुए थे, और प्रतियोगिता को देखने के लिए भी बहुत सारे मेंढ़क वहां एकत्रित हुए। रेस का आरंभ हुआ, चारों ओर शोर ही शोर था। सब उस लोहे के बड़े से खम्भे को देख कर कहने लगे “अरे इस पर चढ़ना नामुमकिन है” “इसे तो कोई भी नहीं कर पायेगा”। “इस खम्भे पर तो चढ़ा ही नहीं जा सकता”।


कभी कोई यह रेस पूरी नहीं कर पाएगा, और ऐसा हो भी रहा था, जो भी मेढ़क खम्भे पर चढ़ने का प्रयास करता, वो खम्भे के चिकने एवं काफी ऊँचा होने के कारण थोड़ा सा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता। बार बार कोशिश करने के बाद भी कोई ऊपर खम्भे पर नहीं पहुँच पा रहा था। अब तक काफी मेंढ़क हार मान गए थे, और कई मेंढ़क गिरने के बाद भी अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे। इसके साथ-साथ अभी भी रेस देखने आए मेंढक जोर-जोर से चिल्लाए जा रहे थे “अरे यह नहीं हो सकता”।


“यह असंभव है” “कोई इतने ऊँचे खम्भे पर चढ़ ही नहीं सकता।” आदि, और ऐसा बार बार सुन सुन कर काफी मेंढक हार मान बैठे और उन्होंने भी प्रयास करना छोड़ दिया। और अब वो भी उन मेंढको का साथ देने लगे जो जोर-जोर से चिल्लाने लगे। लेकिन उन्ही मे से एक छोटा मेंढक लगातार कोशिश करने के कारण खम्भे पर जा पंहुचा, हालाँकि वो भी काफी बार गिरा, उठा, प्रयास किया तब कही जाकर वो सफलता पूर्वक खम्भे पर पहुंचा।

और रेस का विजेता घोषित किया गया। उसको विजेता देखकर, मेढ़को ने उसकी सफलता का कारण पूछा की यह असंभव कार्य तुमने कैसे किया, यह तो नामुमकिन था, यहाँ सफलता कैसे प्राप्त की, कृपया हमे भी बताए। तभी पीछे से एक मेंढ़क की आवाज़ आयी “अरे उससे क्या पूछते हो वो तो बहरा है।”

फिर भी मेढको ने विजेता मेंढक से पता करने के लिए एक ऐसे मेढक की मदद ली, जो उसकी सफलता का कारण जान सके, विजेता मेंढक ने बताया की मैं बहरा हूँ। मुझे सुनाई नही देता, लेकिन जब आप लोग जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, तो मुझे लगा जैसे आप मुझसे कह रहे हो की “यह तुम कर सकते हो, यह तुम्हारे लिए मुमकिन है” इन्ही शब्दों ने मुझे सफलता दिलाई है।

सीख

तो दोस्तों, यह थी मेंढको की कहानी, लेकिन यह कहानी काफी हमारी जिंदगी से भी मिलती जुलती है, क्योंकि हम बाहर दुनिया की सुनते है जो हमेशा हमसे कहती है की “तुम यह नही कर सकते, सफल नही हो सकते, तुम्हारे बस की बात नही है आदि, क्योंकि हमारे अंदर सफलता पाने की क्षमता होती है और हम पा भी सकते है, लेकिन दुसरो की बातों में आ कर अपने लक्ष्य को पाने से चुक जाते है, जिसके कारण हम एक औसत जीवन जीते है। इसलिए आज से हमे उन सभी दृश्य एवं लोगो के प्रति अंधे एवं बहरे हो जाना चाहिए, जो हमे हमारे लक्ष्य से भटकाते है। ऐसा करने से आपको आपकी मंज़िल पाने से कोई नही रोक सकता।

ऐसे ही प्रेरणादायक कहानी पढ़ने के लिए मुझे कमेंट करके बताएं धन्यवाद
आपको यह कहानी कैसी लगी।

Monday, 20 July 2020

हास्य कहनी

हास्य कहानी
एक पंडित जी थे। उनके पास एक मोटी ताजी दुधारू गाय थी। यह गाय किसी ने उन्हें दान में दी थी। गाय के कारण घर में दूध, घी, दही की कमी नहीं होती थी। खा पीकर पंडित जी मोटे तगड़े होते जा रहे थे।

एक शाम की बात है, पंडित जी जैसे ही दूध दुहने गोशाला पहुंचे तो गाय वहां से गायब मिली। खूंटा भी उखड़ा हुआ था। पंडित जी की जान सूख गई। उन्होंने सोचा, ”हो न हो गाय कहीं निकल भागी है।“ गाय चूंकि उन्हें बहुत प्रिय थी सो वह फौरन ढूंढ़ने निकल पड़े।
थोड़ी दूर पर पंडित जी को एक गाय चरती हुई दिखाई दी। वह खुश हो गए। लेकिन सांझ के झुरमुट में यह नहीं जान पाए कि जिसे वह अपनी गाय समझ बैठे हैं, वह पड़ोसी का मरखना सांड़ है। उन्होंने लपककर ज्यों ही रस्सी थामी कि सांड़ भड़क उठा। जब तक सारी बात समझ में आती, देर हो चुकी थी। सांड़ हुंकारता हुआ उनके पीछे दौड़ पड़ा। थुलथुल शरीर वाले पंडित जी हांफते हांफते गिरते पड़ते भाग खड़े हुए।

भागते भागते उनका दम निकला जा रहा था और सांड़ था कि हार मानने को तैयार ही नहीं था। आखिरकार एक गड्डा देखकर पंडित जी उसमें धप से कूद गए। सांड़ फिर भी न माना। पीछे पीछे वह भी गड्डे में उतर पड़ा।

पंडित जी फिर भागे। अबकी बार उन्हें भूसे का एक ढेर दिखा, पंडित जी उस पर कूद गए और दम साधकर पड़े रहे। सांड़ ने भूसे के दो एक चक्कर लगाए और थोड़ी देर ठहर कर इधर उधर उन्हें तलाशता रहा, फिर चला गया। भूसे के ढेर से पंडित जी वापस आए तो उनका रूप बदल चुका था। पूरे शरीर पर भूसा चिपक गया था। वह किसी दूसरे ग्रह के जीव नजर आ रहे थे। तभी उधर से गुजरते हुए एक आदमी की नजर उन पर पड़ी। वह डरकर चीख उठा। उसकी चीख सुनकर दस बीस आदमी मदद को आ जुटे। अब आगे आगे पंडित जी और पीछे पीछे सारे लोग। वह चीखते रह, ”भाइयों, मैं हूं पंडित जी….“ पर लोगों ने एक न सुनी।

आखिरकार बचने का एकमात्र उपाय देखकर पंडित जी एक तालाब में कूद पड़े, तन से भूसा छूटा तो लोग हैरान रह गए। जब सारे लोगों को उनकी रामकहानी मालूम हुई तो सारे वापस अपने घरों को लौट गए।

पंडित जी गाय की खोज में हांफते हांफते आगे बढ़े। गांव के बाहर आम के बाग थे। गाय चरती हुई अक्सर उधर चली जाती थी। पंडित जीम न में एक आशा की किरण लिए आगे बढ़े। उन दिनों आम पकने लगे थे। रखवाले बागों में झोंपड़ी बनाकर रखवाली करते थे। जब उन्होंने चुपके चुपके किसी को बाग में घुसते देखा तो लाठी लेकर शोर मचाते हुए उस और दौड़ पड़े जिस ओर से पंडित जी आ रहे थे। पंडित जी के होश उड़ गए। वह सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए।

भागते भागते वह एक खेत में पहुंचे। खेत में खरबूजे और ककड़ियां बोई थीं। खेत के रखवाले ने गोल मटोल पंडित जी को देखा तो समझा कोई जानवर घुस आया है। वे लाठियां और जलती मशालें लेकर उनके पीछे लपक लिए। अब पंडित जी का धैर्य टूट गया। इस बार भागे तो सीधा घर जाकर रूके। उनकी हालत देखकर पंडिताइन ने पूछा, ”क्यों जी कहां से आ रहे हो?“

पंडित जी हांफते हुए बोले, ”मैं गाय की खोज में दुबला हो गया और तुम पूछती हो कि कहां से आ रहे हो?“

”गाय की खोज? गाय तो घर के पिछवाड़े बंधी है। गौशाला का खूंटा उखड़ गया था। इसलिए मैंने गाय को पिछवाड़े में ले जाकर बांध दिया था।“

पंडिताइन की बात सुनकर पंडित जी ने सिर पीट लिया।

Thursday, 16 July 2020

भगवान का निवास स्थान कहानी

🙏🏼 भगवान का निवास स्थान 🙏🏼

एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये, दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, सन्यासी ने  एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार से पूछा, इसमें क्या है ? 
दुकानदारने कहा - इसमें नमक है। सन्यासी ने फिर पूछा, इसके पास वाले में क्या है ? दुकानदार ने कहा- इसमें हल्दी है। इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा। 
अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा उस अंतिम डिब्बे में क्या है? दुकानदार बोला- उसमें *श्रीकृष्ण* हैं।
सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा- श्रीकृष्ण !! भला यह "श्रीकृष्ण" किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के किसी सामान के बारे में कभी नहीं सुना! 
दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला - महात्मन ! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नहीं कहकर श्रीकृष्ण कहते हैं ! 
संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई !
जिस बात के लिये मैं दर-दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यापारी से समझ आ रही है। वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा, ओह, तो खाली में श्रीकृष्ण रहता है ! सत्य है, भाई! भरे हुए में श्रीकृष्ण को स्थान कहाँ ? 
काम, क्रोध,लोभ,मोह, लालच, अभिमान,ईर्ष्या, द्वेष और भली- बुरी, सुख-दुख, की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ? 
श्रीकृष्ण यानी ईश्वर तो खाली याने साफ-सुथरे मन में ही निवास करता है। 
एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी थी। आज सन्यासी अपने आनंद में था।

🌺🌸 जय श्री कृष्ण 🌸🌺
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